श्रीराम बीस वर्ष का है। अपने वयस्क होने के प्रतीक के रूप में उसकी दादी उसे स्थानीय बैंक में जमा उसकी बचत की पासबुक सौंप देती हैं, लेकिन श्रीराम अन्य तरीकों से भी बड़ा हो रहा है, और एक मनमोहक एवं अप्रत्याशित लड़की उसे महात्मा गांधी के अनुचर-वृंद तक ले जाती है।
ये आर.के.नारायण के उपन्यास की आरंभिक घटनाएँ हैं। यह अब तक की उनकी सर्वोत्तम कृति है, और गांधी की सेवा में एक कच्चे उम्र के उत्साही युवक की विजयों एवं त्रासदियों की उनकी यह कहानी अपनी गर्मजोशी, अपने हास्य, भावुकता से रहित होने और पूर्ण सत्य की छाप के लिए विशिष्ट है।
श्रीराम का पुरुषत्व की ओर विकास उसके लिए एक विचित्र और उलझाने वाली प्रक्रिया है। भारती, जिस लड़की की वह उपासना करता है, चतुर, चिढ़ाने वाली, सक्षम और, आश्चर्यों का आश्चर्य, चंद्रमा से प्रभावित श्रीराम के प्रति कृपालु है। तथापि उसकी प्रथम निष्ठा महात्मा के प्रति है, एक ऐसे संत जो विचलित कर देने वाले व्यावहारिक विवेक से युक्त हैं, एक ऐसे व्यक्ति जिनकी त्रासदी यह है कि वे अपने अनुयायियों से कहीं अधिक महान हैं। उनमें से अधिकांश उनके विचारों को उत्साहपूर्वक स्वीकार करते हैं, और बिना यह समझे, उन्हें अपने अपेक्षाकृत स्थूल व्यक्तित्वों के अनुकूल बनाने के लिए विकृत कर देते हैं। श्रीराम गांधी से प्रेरित हैं, लेकिन वे जगदीश जैसे आतंकवादी प्रकार के आकर्षक देशभक्तों से बहुत आसानी से प्रभावित हो जाते हैं। यह भारतीय राष्ट्रवाद के उभार में उल्लेखनीय अंतर्दृष्टि की एक कथा है, जैसा कि श्रीराम और भारती की आँखों और हृदयों से देखा गया है, और इसे उस सारी प्रतिभा एवं करुणा के साथ कहा गया है जिसकी अपेक्षा हम आर.के.नारायण से करने लगे हैं।
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