Irangani (जिसे Ayirangani या Iranganie भी लिखा जाता है) मार्टिन विक्रमसिंघे (Martin Wickramasinghe, 1890-1976) का तीसरा उपन्यास है, जो पहली बार 1923 में प्रकाशित हुआ, उसी वर्ष जब Seetha प्रकाशित हुआ था। यह सिंहली भाषा का संस्करण है।
यह पुस्तक उनके दूसरे उपन्यास Soma के बाद आई, और उसी की तरह उस भावुक प्रेम-कथा परंपरा से जुड़ी है जो उस समय सिंहली कथा-साहित्य में लोकप्रिय थी। विक्रमसिंघे ने बाद में कहा कि Irangani उस परंपरा से मुक्त होने का उनका प्रयास था, और आलोचक मानते हैं कि यह प्रयास आंशिक रूप से ही सफल हुआ। इसका आकर्षण इसकी नायिका में है। इरंगनी एक युवती है जिसके साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध उसका एक चचेरा भाई, पर्सी रत्नायके, दुराचार करता है और फिर उसे छोड़ देता है, और उसे लज्जा और सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। वह रेजिनाल्ड से विवाह करती है, जो आधुनिक दर्शन और विज्ञान पढ़ने वाला एक शिक्षक है, फिर भी अपने अतीत के बावजूद वही उसे क्षमा करने से इनकार करता है, जबकि वह उसे क्षमा कर देती है। उपन्यास उसकी गरिमा और दृढ़ता को दोनों पुरुषों की कमियों के सामने रखता है।
विद्वान सरत्चंद्र विक्रमसूरिय ने नायिका को एक ऐसी स्त्री बताया है जो स्वतंत्रता और अपनी पहचान की तलाश उस ढंग से करती है जैसे सिंहली कथा-साहित्य की किसी पूर्ववर्ती नायिका ने नहीं की थी, और वे इस विषय को विक्रमसिंघे द्वारा टॉल्स्टॉय के Resurrection (पुनरुत्थान) और हार्डी के Tess of the d'Urbervilles के अध्ययन से जोड़ते हैं। प्रकाशन के कुछ ही महीनों में पुस्तक की सारी प्रतियाँ बिक गईं, हालाँकि लेखक ने बाद में इन आरंभिक प्रेम-कथाओं को कुछ ख़ास महत्व नहीं दिया।
यह संस्करण उन सिंहली पाठकों के लिए उपयुक्त है जो यह देखना चाहते हैं कि विक्रमसिंघे लोकप्रिय प्रेम-कथा से अपने बाद के करियर के गंभीर कथा-साहित्य की ओर कैसे बढ़े, और उन पाठकों के लिए जो जानना चाहते हैं कि आरंभिक सिंहली उपन्यासों में स्त्रियों का चित्रण कैसे हुआ।
- लेखक: Martin Wickramasinghe
- प्रकाशन वर्ष: 1923
- भाषा: सिंहली



